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1.कुरु, 2.पंचाल, 3.शूरसेन, 4.वत्स, 5.कोशल, 6.मल्ल, 7.काशी, 8.अंग, 9.मगध, 10.वृज्जि, 11.चे‍दि, 12.मत्स्य, 13.अश्मक, 14.अवंति, 15.गांधार और 16.कंबोज।


उत्पत्ति के अनुसार चट्टान तीन प्रकार की होती है -

1. आग्नेय चट्टान
2. अवसादी चट्टान
3. रूपान्तरित चट्टान या कायान्तरित चट्टान

1.आग्नेय चट्टान--

वह चट्टानें हैं, जिनका निर्माण ज्वालामुखी से निकले मैग्मा या लावा से होता है। जब तप्त एवं तरल मैग्मा ठण्डा होकर जम जाता है और ठोस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो इस प्रकार की चट्टानों का निर्माण होता है। माना जाता है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के पश्चात सर्वप्रथम इन चट्टानों का ही निर्माण हुआ था। इसीलिए ये चट्टानें 'प्राथमिक चट्टानें' भी कही जाती हैं।
आग्नेय शब्द लैटिन भाषा के 'इग्निस' से लिया गया है, जिसका सामान्य अर्थ अग्नि होता है।
आग्नेय चट्टान स्थूल परतरहित, कठोर संघनन एवं जीवाश्मरहित होती हैं।
ये चट्टानें आर्थिक रूप से बहुत ही सम्पन्न मानी गई हैं।
इन चट्टानों में चुम्बकीय लोहा, निकिल, ताँबा, सीसा, जस्ता, क्रोमाइट, मैंगनीज, सोना तथा प्लेटिनम आदि पाए जाते हैं।
झारखण्ड, भारत में पाया जाने वाला अभ्रक इन्हीं शैलों में मिलता है।
आग्नेय चट्टान कठोर चट्टानें हैं, जो रवेदार तथा दानेदार भी होती है।
इन चट्टानों पर रासायनिक अपक्षय का बहुत कम प्रभाव पड़ता है।
इनमें किसी भी प्रकार के जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।
आग्नेय चट्टानों का अधिकांश विस्तार ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाया जाता है।

2. अवसादी चट्टान--


* अवसादी चट्टान

अवसादी चट्टान से तात्पर्य है कि, प्रकृति के कारकों द्वारा निर्मित छोटी-छोटी चट्टानें किसी स्थान पर जमा हो जाती हैं, और बाद के काल में दबाव या रासायनिक प्रतिक्रिया या अन्य कारकों के द्वारा परत जैसी ठोस रूप में निर्मित हो जाती हैं। इन्हें ही 'अवसादी चट्टान' कहते हैं। अवसादी शैलों का निर्माण जल, वायु या हिमानी, किसी भी कारक द्वारा हो सकता है। इसी आधार पर अवसादी शैलें 'जलज', 'वायूढ़' तथा 'हिमनदीय' प्रकार की होती हैं।
अवसादी चट्टानें अधिकांशत: परतदार रूप में पाई जाती हैं।
इनमें वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के जीवाश्म बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं।
इन चट्टानों में लौह अयस्क, फ़ॉस्फ़ेट, कोयला, पीट, बालुका पत्थर एवं सीमेन्ट बनाने की चट्टान पाई जाती हैं।
खनिज तेल अवसादी चट्टानों में पाया जाता है।
अप्रवेश्य चट्टानों की दो परतों के बीच यदि प्रवेश्य शैल की परत आ जाए, तो खनिज तेल के लिए अनुकूल स्थिति पैदा हो जाती है।
दामोदर, महानदी तथा गोदावरी नदी बेसिनों की अवसादी चट्टानों में कोयला पाया जाता है।
आगरा क़िला तथा दिल्ली का लाल क़िला बलुआ पत्थर नामक अवसादी चट्टानों से ही बना है।
प्रमुख अवसादी शैलें हैं- बालुका पत्थर, चीका शेल, चूना पत्थर, खड़िया, नमक आदि।

अवसाद शैलों का निर्माण तीन प्रकार से होता है। पहले प्रकार के शैलों का निर्माण विभिन्न खनिजों और शिलाखंडों के भौतिक कारणों से टूटकर इकट्ठा होने से होता है। विभिन्न प्राकृतिक आघातों से विदीर्ण रेत एवं मिट्टी नदियों या वायु के झोकों द्वारा परिवाहित होकर उपयुक्त स्थलों में एकत्र हो जाती है और पहली प्रकार की शिलाओं को जन्म देती है। ऐसी शिलाओं को व्यपघर्षण (डेट्राइटल) या एपिक्लास्टिक शैल कहते हैं। बलुआ पत्थर या शैल इसी प्रकार की शिलाएँ हैं। दूसरे प्रकार के शैल जल में घुले पदार्थों के रासायनिक निस्सादन (प्रसिपिटेशन) से निर्मित होते हैं। निस्सादन दो प्रकार का होता है, या तो जल में घुले पदार्थों की पारस्परिक प्रतिक्रियाओं से या जल के वाष्पीकरण से। ऐसी शिलाओं को रासायनिक शैल कहते हैं। विभिन्न कार्बोनेट, जैसे चूने का पत्थर, डोलोमाइट आदि फास्फेट एवं विविध लवण इसी वर्ग में आते हैं। तीसरे प्रकार के शैलों के विकास में जीवों का हाथ है। मृत्यु के उपरांत प्रवाल (मूँगा), शैवाल (ऐल्जी), खोलधारी जलचर, युक्ताप्य (डाइऐटोम) आदि के कठोर अवशेष एकत्रित होकर शैलों का निर्माण करते हैं। मृत वनस्पतियों के संचयन से कोयला इसी प्रकार बना है। रासायनिक शिलाओं के निर्माण में जीवाणुओं का सहयोग उल्लेखनीय है। सूक्ष्म जीवाणुओं की उत्प्रेरणाओं से जल में घुले पदार्थों का निस्सादन तीव्र हो जाता है।

अवसाद शैलों के इतिहास में अवयवों के उद्गमस्थान, उनका परिवहन, संचयन और स्तरीभजन महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। किसी अवसाद शैल की खनिजसंरचना उस पूर्वस्थित शैल की संरचना पर निर्भर रहती है जिसके अपक्षय से वह निर्मित हुआ है। उदाहरण के लिए, बिहार के कोयला उत्पादक क्षेत्र में गहराई पर पाए जानेवाले बलुआ पत्थरों के जनक शैल हैं पुरातन "ग्रेनाइट' एवं "नाइस' जिनकी सरंचना के अभिन्न और आवश्यक संघटक हैं। "क्वोर्ट्‌ज' एवं "फ़ेल्सपार'। उपर्युक्त बलुआ पत्थर में भी इन दो खनिजों की प्रचुरता है। यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि जनक शैल और अवसाद शैल की खनिजसंरचना में पूर्ण सादृश्य होता है। वस्तुत: ऋतुक्षरण एवं परिवहन की अवधि में वे ही खनिज बच पाते हैं जिनकी आंतरिक रचना सुदृढ़ होती है और कलेवर कठोर होता है। अधिक गर्मी और वर्षावाले प्रदेशों में रासायनिक क्रियाओं की उग्रता के कारण बहुत कम खनिज अपरिवर्तित रह पाते हैं; अत: मूल जनक शैल एवं अवसाद शैल में केवल दूरस्थ सादृश्य ही होगा।

परिवहन की अवधि में कणों का यांत्रिक (मिकैनिकल) घर्षण पर्याप्त प्रखर होता है। फलत: कणों का परिमाण छोटा और आकार गोल हो जाता है। कणों की गोलाई के अवसादों की यात्रा की लंबाई का अच्छा पता लगता है। अवसादों के निर्माण में पृथक्करण (सार्टिग) एक महत्वपूर्ण कार्य है। इस पृथक्करण का आधार कणों का परिमाण एवं उनका घनत्व रहता है। फलस्वरूप छोटे-छोटे कण एक साथ एकत्र होते हैं और बड़े-बड़े कण उनसे अलग। यह पृथक्करण परिवहन की अवधि में ही कार्यान्वित होता रहता है और इस क्रिया में परिवहन के साधन जल या वायु या हिम का महत्व स्वाभाविकरूप में सर्वाधिक होता है। पृथक्करण एवं घर्षण की सामर्थ्य में वायु का स्थान प्रथम, जल का द्वितीय और हिम का तृतीय है।

अवसादों के संचयन का सर्वाधिक विस्तृत एवं स्थायी क्षेत्र है सागर। सागर के अतिरिक्त झील, दलदल, नदियों की घाटियों ओर उनके बाढ़ग्रस्त मैदान आदि भी संचयन के क्षेत्र हैं, किंतु ये अस्थायी होते हैं। पूर्णत: रासायनिक एवं जैविक अवसादन केवल ऐसे वातावरण में होते हैं जहाँ जल गंदा न हो। उष्ण एवं उथले सागरों में रासायनिक निस्सादन अपेक्षाकृत तीव्र होता है। ऐसी बंद खाड़ियों में जहाँ जल का वाष्पीकरण उग्र रूप में होता है, लवणों के निक्षेप निर्मित होते हैं।


अवसाद शैलों में प्राय: जीवों के अवशेष समाधिस्थ रहते हैं। उनसे न केवल तत्कालीन वातावरण का ज्ञान होता है, अपितु वे शैलों की आयु के भी परिचायक होते हैं। त्रिखंडी (ट्राइलोबाइट), केकड़े के पुरातन पूर्वज, शीर्षपादा (सेफ़ालोपोडा) और कुछ सीप (पेलेसिपोडा) आदि सर्वदा सामुद्रिक वातावरण के द्योतक हैं। कुछ प्रकार के घोंघे (गैस्ट्रोपॉड), कुछ पादछिद्रिण (फ़ोरामिनिफ़ेरा) मीठे पानी वाले असामुद्रिक वातावरण के परिचायक हैं।

कुछ विशिष्ट खनिजों की उपस्थिति भी बड़ी महत्वपूर्ण होती है। उदाहरणस्वरूप हरे रंग के खनिज आहरितिज (ग्लॉकोनाइट) से गहरे पानी में शैल के उद्भव का संकेत मिलता है। शैलों का लाल रंग लोहे के आक्साइड के कारण होता है। यह रंग शुष्क मरुस्थलीय वातावरण का सूचक है।

3. रूपांतरित चट्टान--

रूपांतरित चट्टान में संगमरमर, क्वार्ट्जाइट आदि का मिश्रण होता है।
अवसादी एवं आग्नेय चट्टान में ताप एवं दबाव के कारण परिवर्तन या 'रूपांतरण' हो जाने से रूपांतरित चट्टान का निर्माण हाता है।
क्वार्ट्ज, फेल्सपार, एम्फीबोल, माइका, पाइरोक्सिन और ऑलिविन जैसे सिलिकेट खनिज पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को पीडोस्फीयर कहते हैं। इस परत का निर्माण मृदा से हुआ है और इस स्तर पर लगातार मृदा उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है।


List of Chapters – बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र 

(A) Child Development (बाल विकास)

  1. Concept of Development and its Relationship with Learning
    विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध
  2. Principles of Child Development
    बाल विकास के सिधांत
  3. Influence of Heredity and Environment
    वंशानुक्रम एवं वातावरण का प्रभाव
  4. Socialization Process
    समाजीकरण की प्रक्रिया
  5. Theory of Piaget, Kohlberg and Vygotsky
    पियाजे, कोह्ल्बर्ग एवं व्यगोत्सकी के सिधांत
  6. Concept of Child-Centered and Progressive Education
    बाल केन्द्रित एवं प्रगतशील शिक्षा की अवधारणा
  7. Construct of Intelligence and Multi-Dimensional Intelligence
    बुद्धि निर्माण एवं बहुआयामी बुद्धि
  8. Language and Thought
    भाषा और चिंतन 
  9. Gender Issues in Social Construct
    समाज निर्माण में लेंगिक मुद्दे
  10. Individual Differences
    व्यक्तिक विभिन्नताएं
  11. Assessment of Learning
    अधिगम का मूल्याङ्कन
  12. Evolution Achievement and Formation of Questions
    उपलब्धि का मूल्याङ्कन एवं प्रश्नों का निर्माण
  13. Identify the Child of Diverse Backgrounds
    विविध प्रष्ठभूमि के बालकों की पहचान
  14. Identifying the Needs of Children with Learning Difficulties
    शारीरिक रूप से विकलांग तथा अधिगम अशक्तता वाले बच्चों की पहचान
  15. Identify the Talented, Creative, Especially-Abled Learners
    प्रतिभा शाली, स्रजनात्मक तथा विशिष्ठ बालकों की पहचान

Learning and Pedagogy

  1. Thinking and Learning in Children
    बच्चों में सोचना एवं सीखना 
  2. Basic Processes of teaching Learning
    शिक्षण अधिगम की मूल प्रक्रियाएं
  3. Child as a Problem-Solver and a Scientific Investigator
    बच्चा – एक समस्या-समाधक तथा एक वैज्ञानिक अन्वेषक के रूप में
  4. Alternative Conceptions of Learning in Children
    बच्चों में अधिगम की वैकल्पिक अव्धार्नाएं
  5. Cognition and Emotion
    संज्ञान तथा संवेग
  6. Motivation and Learning
    प्रेरणा तथा सिखाना
  7. Factors, Contributing to Learning
    अधिगम में योगदान करने वाले करक
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The Human EYE

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